छोटी मुलाकात बड़ी बात

मेरी बात
 
दिल्ली के प्रगति मैदान में विश्वपुस्तक मेला-2018 का आयोजन हो रहा है। बचपन से ही मुझे किताबें अपनी ओर खींचती है। इसलिए पुस्तक मेला हो और मैं न जाऊ ऐसा मश्किल है। मैंने अपने दफ्तर के अवकाश के दिन वहां जाना तय किया। इस विषय में अपने मित्र श्रवण से बात की तो वह भी राजी हो गया। हम पुस्तकों के इस सागर में अपना-अपना मोती खोज रहे थे। इसी बीच श्रवण को फोन आया और उसे जाना पड़ा। लेकिन मेरी खोज अभी पूरी नहीं हुई थी। कैसे वहां हर किताब को खोलते-बंद करते पांच घंटे से ज्यादा बीत गए पता ही नहीं चला। किसी खास किताब की खोज करते करते मैं गीता प्रेस गोऱखपुर के स्टॉल पर जा पहुंचा। वहां का नजारा सामान्य की तुलना में थोड़ा भिन्न था। हालांकि यह अन्य लोगों के लिए सामान्य हो सकता है। पर मुझे थोड़ा अलग लगा। क्योंकि वहां दो युवक किन्हीं खास किताबों के लिए एक स्ट़ॉल कर्मचारी से बात करने में व्यस्त थे। वहीं अन्य दो युवक उस भीड़ में अपनी पसंद की किताब खंगाल रहे थे। उनकी बातचीत हावभाव आपको उन्हें देखने के लिए विवश कर देते। बशर्ते आप अपनी दुनिया में मशरूफ न हों। मैं वहां खड़ा उन्हें ही देख रहा था। सिर पर नीली पगड़ी और नीली जैकेट पहने वह छह फुटा नौजवान पीठ पर एक बड़ा सा थैला लिए था। 
 
जिज्ञासा वश मैं उसके पास गया और पुछा- आप शायद किसी विशेष किताब खोज रहे हैं ?
उसने कहा- हां, पर शायद इनके पास वो किताब नहीं है।
 
मैं ने पुछा- आप कौन सी किताब ढूंढ रहे हैं ?
 
युवक बोला- मैं सभी वेदों के संपूर्ण भाग चाहता हूं। लेकिन अभी इनके पास नहीं है। पऱेशानी ये है कि रात को ही मुझे अमृतसर की ट्रेन लेनी है और कल तक यहां मैं रुक नहीं सकता।
 
इसी बातचीत में पता चला कि युवक का नाम रेशम सिंह है। वह स्नातक का विद्य़ार्थी है। 21 वर्ष का यह नौजवान दो पूराण पढ़ चुका है। अपने साथियों के साथ इस पुस्तक मेले के लिए विशेष रुप से अमृतसर से आया है। मैंने सवाल किया कि सरदार होते हुए आपकी इन ग्रंथों में कैसे रुची हुई? क्योंकि अब सनातनी भी इन्हें कम पढ़ते हैं। उसने कहा- यह धर्म की मूल पुस्तकें हैं। इनके दर्शन को मैं समझना चाहता हूं।
बातों-बातों में निकल कर आया कि उसने गुरुवाणी पढ़ी हुई है और वह अन्य मतों (धर्म) की पुस्तकों को पढ़ने की इच्छा रखता है।
 
उसने कहा- किसी भी चीज के विरोध से पहले उसके बारे में गहराई से जानना आवश्यक है। आजकल विरोध के लिए किताबों को जलाया जाता है।
 
उसकी यह बात मुझे बेहद पसंद आई क्योंकि आजकल हमारे देश में किताबों को जलाना चलन में है। बहुत कम होंगे जिन्होंने जलाने से पहले उसे पढ़ा होगा। मेरी जाति मेरा धर्म, मेरा प्रदेश, मेरा नेता करते-करते हम अपने देश को भूल गए हैं। अपने मूल को जाने बिना ही उस पर सवाल खड़े करने लगे हैं। सही सवाल करने के लिए भी विषय वस्तु को जानना आवश्यक है।
 

इस तरह धर्म व अन्य विषयों पर इस युवक से छोटी चर्चा के बाद हमने साथ में एक फोटो ली और अपने गंतव्य की ओर चल दिए। 

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