तर्क कम भावनाएं अधिक हावी हैं किसान आंदोलन में

नजरिया

एडिटोरियल डेस्कः किसान आंदोलन को आज 84 दिन से अधिक बीत चुके हैं। लेकिन सरकार और किसानों के बीच कई दौर की वार्ता होने के बाद भी कोई समाधान नहीं निकला है। 26 जनवरी को लाल किले पर खालिस्तानी झंडा लहराने के बाद जनता में भी किसान आंदोलन के प्रति सहानुभुति में कमी आई है। लेकिन संयुक्‍त किसान मोर्चा ने 26 जनवरी की हिंसा से कोई सबक न लेते हुए 18 फरवरी को देशव्यापी रेल रोकों आंदोलन का ऐलान कर दिया है। किसान दोपहर 12 से लेकर शाम 4 बजे तक देशभर में रेल का चक्का जाम करने की कोशिश करेंगे। हालांकि प्रशासन ने भी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम होने का दावा किया है।

लेकिन अगर पुरानी कड़ियों पर नजर डालें तो 2 फरवरी को अमेरिकन पॉप सिंगर रिहाना किसान आंदोलन के समर्थन में एक ट्वीट करती है। इस ट्वीट के बाद विपक्ष को मोदी सरकार पर निशाना साधने का एक और मौका मिल जाता है। विपक्ष समेत किसान आंदोलन के समर्थक इस ट्वीट को धड़ा-धडा शेयर करने लगते हैं। लेकिन इस ट्वीट के अगले ही दिन यानी 3 फरवरी को स्वीडन की पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग शाम करीब साढे पांच बचे एक ट्वीट करती हैं। ट्वीट में गुगल का लिंक शेयर करते हुए लिखती हैं कि किसान आंदोलन के लिए आप इस टूलकिट की मदद ले सकते हैं। कुछ ही देर में इस ट्वीट को हजारों लोग लाइक और रिट्वीट करते हैं। लेकिन इस ट्वीट से जिस डॉक्यूमेंट को शेयर किया। उससे स्पष्ट है कि भारतीय गणतंत्र दिवस पर लाल किले पर हुई हिंसा से लेकर रिहाना के ट्वीट तक सब कुछ वामपंथियों और खालिस्तानियों द्वारा सुनियोजित था।

डॉक्युमेंट को पोयटिक जस्टिस फाउंडेशन ने तैयार किया था। हालांकि इस संस्था ने 6 फरवरी को एक स्टेटमेंट जारी कर भारत में हो रहे किसान आंदोलन में अपना हाथ होने से इंकार कर दिया है। लेकिन इस संस्था के सह-संस्थापक एमओ धालीवाल खालिस्तान समर्थक हैं और खुद को खालिस्तानी बताते हैं। धालीवाल का एक वीडियो वायरल हो रहा है जो कनाडा के वेंकुवर का बताया जा रहा है। जब भारत गणतंत्र दिवस मना रहा था। उस समय धालीवाल भारत को तोड़ने की बातें कह रहा था। वीडियो में यह साफ कहता सुनाई दे रहा है कि उनका लक्ष्य केवल कृर्षि बिलों को रद्द कराना नहीं है, बल्कि खालिस्तान बनाना है। वहीं इस पूरे संदर्भ को देखे तो किसान आंदोलन के आड़ में खालिस्तान को हवा दी जा रही है। इसमें भारत में बैठे हजारों वामपंथी हैं जो चैनल, एनजीओं और एक्टीविस्ट के मुखौठों के पीछे छिपे बैठे हैं।

वक्त आ गया है। जनता इनकी सच्चाई समझें। केवल सरकार पर दोषारोपण करने से कुछ हासिल नहीं होगा। बल्कि ऐसे नाजुक मौकों पर जनता का भी फर्ज बनता है कि वह देश में छिपे जयचंदों को निकालने में सरकार की मदद करें।

यूनानी दार्शनिक अरस्तु ने आज से करीब दो हजार साल पहले कहा था कि लोकतंत्र मुर्खों की व्यवस्था है। क्योंकि अगर मुर्खों की अधिक संख्या होगी तो मुर्ख ही शासन करेंगे। किसान आंदोलन को इससे अलग करके नहीं देखा जा सकता जहां तर्क कम और भावनाएं अधिक हावी हैं। तीनों कृर्षि कानून की समीक्षा के स्थान पर इन्हें पूरी तरह से नकार देना किसानी नहीं कोरी राजनीति है।

ये ऐसा पहला आंदोलन है जिसका फायदा किसानों से अधिक विपक्षी पार्टियां, पाकिस्तान, वामपंथी और खालिस्तानी उठाने की कोशिश कर रहे हैं। बेंगलुरू से तथाकथित पर्यावरण एक्टीविस्ट दिशा रवि की गिरफ्तारी और उसके कबूल नामें ने काफी कुछ साबित कर दिया है। फिर भी कुछ तथाकथित पत्रकार और वामपंथियों का धड़ा उसे बचाने के लिए एक्टिव है। लेकिन कुछ लोग मोदी विरोध में इतने अंधे हो चुके हैं कि सबकुछ साफ होने के बाद भी देश विरोधियों के साथ खड़े हैं।

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