Mahatma Jyotiba Phule Jayanti: समतावादी समाज के निर्माता महात्मा फुले की विरासत पर एक दृष्टि

मेरी बात
महात्मा ज्योतिबा फुले


✍🏻 डाॅ. वीरेन्द्र भाटी मंगल

विचार डेस्क: भारत के सामाजिक नवजागरण में एक अमिट छाप छोड़ने वाले महापुरुष महात्मा ज्योतिबा फुले उन महान विभूतियों में से हैं, जिन्होंने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण समाज के वंचित, शोषित और पिछड़े वर्गों के उत्थान को समर्पित कर दिया। वे समाज सुधारक, लेखक, विचारक, दार्शनिक, क्रांतिकारी और सच्चे मानवतावादी थे। उन्हें स्नेहपूर्वक ‘महात्मा फुले’ या ‘जोतिबा फुले’ के नाम से जाना जाता है।

जीवन और प्रारंभिक संघर्ष

महात्मा फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को पुणे के खानवाड़ी में हुआ। उनके पिता गोविंदराव और माता चिमनाबाई थे। दुर्भाग्यवश, महज एक वर्ष की उम्र में ही उन्होंने अपनी मां को खो दिया। उनका पालन-पोषण सगुणाबाई नामक एक दाई ने किया। फुले परिवार पारंपरिक रूप से फूलों का व्यापार करता था, जिससे उन्हें ‘फुले’ उपनाम मिला।

जातिगत भेदभाव के कारण उन्हें शिक्षा में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, परन्तु उन्होंने 21 वर्ष की आयु में अंग्रेजी माध्यम से 7वीं कक्षा तक की पढ़ाई पूर्ण की। यह उनके जीवन का वह मोड़ था, जहां से उन्होंने सामाजिक अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का बीड़ा उठाया।

स्त्री शिक्षा की अलख

सन् 1840 में उनका विवाह सावित्रीबाई फुले से हुआ। फुले ने स्वयं उन्हें शिक्षित किया और वे भारत की पहली महिला अध्यापिका बनीं। इस युगल ने समाज में स्त्री शिक्षा की नींव रखी। 1 जनवरी 1848 को उन्होंने पुणे में कन्याओं के लिए भारत का पहला विद्यालय खोला। शिक्षिका न मिलने पर उन्होंने स्वयं अपनी पत्नी को तैयार किया। अनेक बाधाओं और विरोधों के बावजूद उन्होंने एक के बाद एक कुल 18 स्कूल स्थापित किए – यह कार्य अपने आप में एक सामाजिक क्रांति था।

समतामूलक समाज की स्थापना

जाति-प्रथा, अंधश्रद्धा, छुआछूत और स्त्री उत्पीड़न के खिलाफ वे सदैव मुखर रहे। उन्होंने 1873 में ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की, जिसका उद्देश्य समाज के सभी वर्गों को शिक्षा और समानता दिलाना था। वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने बिना पुरोहित के विवाह संस्कार आरंभ कर ब्राह्मणवादी परंपरा को चुनौती दी। उन्होंने विधवा विवाह का समर्थन किया और सैकड़ों विधवाओं की शादियाँ सम्पन्न करवाईं।

सामाजिक परिवर्तन की अनेक पहलें

महात्मा फुले ने समाज के बहुआयामी सुधारों की पहल की:

  • स्त्रियों के अधिकारों के लिए संघर्ष
  • बाल विवाह का विरोध और विधवा पुनर्विवाह का समर्थन
  • छुआछूत के खिलाफ अपने घर का कुआं सभी जातियों के लिए खोलना (1868)
  • बाल हत्या विरोधी गृह की स्थापना (1853)
  • किसानों और मजदूरों के अधिकारों की रक्षा
  • नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था
  • विधवा आश्रम की स्थापना और दलितों के लिए घरों का निर्माण
  • अकाल राहत के लिए 52 अन्न क्षेत्रों की स्थापना
  • रात्रिकालीन विद्यालयों की शुरुआत

साहित्य और विचारधारा

महात्मा फुले केवल समाज सुधारक ही नहीं, बल्कि एक प्रखर लेखक और चिंतक भी थे। उनकी प्रमुख रचनाएं हैं:

  • गुलामगिरी (1873)
  • किसान का कोड़ा (1882–83)
  • अछूतों की कैफियत
  • तृतीय रत्न
  • राजा भोसला का पखड़ा
  • क्षत्रपति शिवाजी

इन कृतियों के माध्यम से उन्होंने सामाजिक अन्याय के विरुद्ध जन-जागरण फैलाया और पीड़ित वर्गों की आवाज़ को बुलंद किया।

सम्मान और विरासत

महात्मा फुले के कार्यों की व्यापक सराहना हुई। 11 मई 1888 को मुंबई में एक विशाल सभा में विट्ठलराव कृष्णाजी वंडेकर ने उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि से सम्मानित किया। वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने ‘दलित’ शब्द का प्रयोग कर उस वर्ग की पहचान को स्वर दिया।

28 नवम्बर 1890 को पुणे में उनका निधन हुआ, परंतु उनके विचार, कार्य और समर्पण आज भी समाज सुधार के प्रेरणास्त्रोत बने हुए हैं।


महात्मा ज्योतिबा फुले भारतीय इतिहास की वह दिव्य हस्ती हैं, जिन्होंने अपने विचारों, कार्यों और संघर्षों से एक नई सामाजिक चेतना को जन्म दिया। वे समतामूलक समाज के अग्रदूत थे, जिन्होंने शिक्षा, समानता और न्याय की लौ जलाकर समाज को एक नई दिशा दी। उनकी जयंती पर हम सबका कर्तव्य है कि उनके आदर्शों और संघर्षों को आत्मसात करते हुए, एक समतामूलक और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण की दिशा में कार्य करें। (ये लेखक के निजी विचार हैं)


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