
✍🏻 डाॅ. वीरेन्द्र भाटी मंगल
विचार डेस्क: भगवान महावीर के सिद्धांत आज वैज्ञानिक दृष्टि से भी पूर्णतः स्वीकार्य हो चुके हैं। उन्होंने जिस अहिंसक मार्ग पर चलने की शिक्षा दी थी, वही मार्ग आज एक स्वस्थ, समृद्ध और सुखी समाज के निर्माण का आधार बन सकता है। मानव समाज के विकास के लिए शांति आवश्यक है और समाज के हर वर्ग के परस्पर विकास से अनेक समस्याओं का समाधान संभव है।
महावीर का दृष्टिकोण यह था कि न केवल अभाव, बल्कि अत्यधिक उपलब्धता भी हानिकारक होती है। उनकी शिक्षाओं से पर्यावरण असंतुलन, युद्ध, आतंकवाद, हिंसा, धार्मिक असहिष्णुता और गरीबों के आर्थिक शोषण जैसी ज्वलंत समस्याओं का समाधान संभव है। उन्होंने लगभग 2600 वर्ष पूर्व एक वैज्ञानिक रूप से संतुलित, अहिंसक जीवनशैली अपनाने की शिक्षा दी, जो आज भी समाज के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।
अहिंसा का गहरा महत्व
महात्मा गांधी के अनुसार, मनुष्य को पशु से भिन्न करने वाली सबसे बड़ी विशेषता अहिंसा ही है। यदि व्यक्ति हिंसक है, तो वह पशु के समान है। मनुष्य बनने के लिए अहिंसा का भाव अनिवार्य है। गांधी जी का विचार था कि समाजवाद या साम्यवाद की नींव भी अहिंसा पर होनी चाहिए, जिसमें मालिक-मजदूर या जमींदार-किसान के बीच परस्पर सौहार्द्र बना रहे।
गांधी जी ने स्पष्ट किया था कि निःशस्त्र अहिंसा की शक्ति, किसी भी सशस्त्र शक्ति से अधिक प्रभावशाली होती है। जीवन में बहादुरी, निर्भीकता, सत्यनिष्ठा और स्पष्टता इस स्तर तक विकसित हो जाए कि व्यक्ति तीर-तलवार से भी न डरे, वही सच्ची अहिंसा की साधना है। शरीर की नश्वरता को स्वीकारते हुए उसके न रहने पर भी विचलित न होना, और मन, वचन, काया से किसी भी जीव को तनिक भी कष्ट न देना ही वास्तविक अहिंसा है। वाणी भी मधुर और विनम्र होनी चाहिए।
आज के संदर्भ में अहिंसा की प्रासंगिकता
आज के दौर में अहिंसा को केवल उपदेश तक सीमित मान लिया गया है। लोग सोचते हैं कि इससे कोई परिवर्तन नहीं आ सकता। यह सोच समस्याओं से पलायन का संकेत है और महावीर, बुद्ध और गांधी जैसे महापुरुषों के सिद्धांतों में विश्वास की कमी को दर्शाती है। जबकि इन महापुरुषों ने अपने जीवन में अहिंसा को न केवल अपनाया, बल्कि इसे एक सकारात्मक और प्रभावशाली शक्ति के रूप में प्रयोग करके सिद्ध भी किया।
जैन संत आचार्य तुलसी ने कहा था कि अगर हिंसा का प्रशिक्षण दिया जा सकता है, तो अहिंसा का क्यों नहीं? आज हमारा मस्तिष्क हिंसा के लिए प्रशिक्षित हो गया है और यही कारण है कि लोग हिंसा को समस्याओं का समाधान मानने लगे हैं। लेकिन अगर व्यक्ति को अहिंसा का प्रशिक्षण दिया जाए, तो उसका मानसिक दृष्टिकोण बदला जा सकता है।
अहिंसा के प्रशिक्षण की आवश्यकता
दार्शनिक आचार्य महाप्रज्ञ ने कहा था कि लोगों की अहिंसा में आस्था तो है, लेकिन गहराई नहीं है। इसलिए जरूरी है कि समाज में अहिंसा की आस्था को मजबूत करने के लिए प्रशिक्षित व्यवस्था की जाए। जिस प्रकार पुलिस और सेना तैयार की जाती हैं, वैसे ही ‘अहिंसक सैनिकों’ की भी एक जमात खड़ी की जानी चाहिए। तभी अहिंसा की चेतना जन-जन में फैल सकती है।
महाप्रज्ञ के अनुसार, हिंसक ताकतों का मुकाबला करने के लिए अहिंसक व्यक्तित्वों की जरूरत है, जो प्रशिक्षण के माध्यम से तैयार किए जा सकते हैं।
आधुनिक समाज में अहिंसा की व्यापक परिभाषा
तेरापंथ धर्मसंघ के आचार्य महाश्रमण, जो देशभर में ‘अहिंसा यात्रा’ पर हैं, का मानना है कि शांति केवल अहिंसा से ही संभव है। अहिंसा का अर्थ केवल किसी जीव की हत्या न करना नहीं है, बल्कि किसी को पीड़ा न पहुँचाना और उसके अधिकारों का हनन न करना भी अहिंसा ही है।
आज के दौर में जब चारों ओर विनाशकारी शस्त्रों का अंबार लगा है, गरीबी और अभाव के कारण लोग नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं, तब अहिंसा की शिक्षा पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गई है। सेना में लाखों सैनिक प्रतिदिन युद्धाभ्यास करते हैं और हिंसा के प्रशिक्षण में अत्याधुनिक तकनीकों और संसाधनों का उपयोग किया जा रहा है।
ऐसे में प्रश्न उठता है कि जब हिंसा के प्रशिक्षण में इतनी ऊर्जा और संसाधन झोंके जा सकते हैं, तो क्या अहिंसा के प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं है?
हिंसा के कारण और समाधान
हिंसा के दो मुख्य कारण हैं – आंतरिक और बाहरी। आंतरिक कारणों में सबसे प्रमुख है तनाव, जो व्यक्ति को हिंसा की ओर ले जाता है। दूसरा है रासायनिक असंतुलन – जब शरीर की ग्रंथियों में बनने वाले रसायनों में असंतुलन आ जाता है। तीसरा कारण है नाड़ी-तंत्र का असंतुलन, जो व्यक्ति को आवेग में हिंसा की ओर प्रेरित करता है। और चौथा है निषेधात्मक दृष्टिकोण – जैसे घृणा, ईर्ष्या, भय, कामवासना आदि, जो व्यक्ति के भावतंत्र को प्रभावित करते हैं और उसे हिंसा में प्रवृत्त करते हैं।
समाज निर्माण में युवाओं की भूमिका
आज के युवाओं के सामने ऐसे आदर्शों की कमी है, जिन्हें वे अपनाकर अपने जीवन को दिशा दे सकें। महात्मा गांधी हर पीढ़ी के लिए आदर्श रहे हैं और आगे भी रहेंगे। वर्तमान में भारत सांस्कृतिक और राजनीतिक परिवर्तनों के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में सरकारों का कर्तव्य है कि वे सामाजिक बदलावों को सही दिशा देने के लिए गांधीजी और भगवान महावीर के सिद्धांतों को जन-जन तक पहुँचाएं, और अहिंसा के प्रशिक्षण के लिए एक मजबूत पृष्ठभूमि तैयार करें।
केवल धर्मग्रंथों को पढ़ने या प्रवचन सुनने से अहिंसा जीवन में नहीं उतरेगी। इसके लिए संगठित और व्यवहारिक प्रशिक्षण की आवश्यकता है। तभी हम एक शांत, सुरक्षित और विकसित समाज की ओर अग्रसर हो सकेंगे।


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