
नेशनल डेस्क: जंगल राज शाब्दिक रूप से “जंगल का कानून” को दर्शाता है – अर्थात् ऐसी स्थिति जहाँ ताकतवर की ही चलती है और कानून-व्यवस्था नाम मात्र रह जाती है। बिहार में यह शब्द विशेष रूप से 1990 से 2005 के बीच का वर्णन करता है, जब राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव (1990-97) एवं उनकी पत्नी राबड़ी देवी (1997-2005) के शासन काल में अपराध अपने चरम पर था। विपक्षी दल और मीडिया इस 15 वर्षीय दौर को “जंगल राज” कहते हैं क्योंकि आरोप थे कि इस काल में अपराधियों को खुली छूट मिली हुई थी, अपहरण, फिरौती, हत्या, लूटपाट जैसी वारदातें आम हो चली थीं। यह मुहावरा उस समय इतना प्रचलित हुआ कि पटना उच्च न्यायालय ने भी अगस्त 1997 में एक मामले की सुनवाई के दौरान राज्य की विधि-व्यवस्था की दुर्दशा को दर्शाने हेतु “जंगल राज” शब्द का उपयोग किया। बिहार में जंगल राज आज भी एक कड़वी याद के रूप में उल्लेखित होता है, जो राज्य में क़ानून के राज के अभाव और व्यापक कुप्रशासन का प्रतीक है।
अपराध का बोलबाला और बड़ी वारदातें
इस दौर में अपराध दर आसमान छू रहे थे। हत्या, अपहरण, फिरौती व दंगों की घटनाएँ इतनी बढ़ गईं कि मानो अपराधिक गतिविधियाँ “उद्योग” बन गई हों। आंकड़ों पर नज़र डालें तो 1990-2005 के बीच 5243 से अधिक अपहरण फिरौती के लिए दर्ज हुए और 12,000 से अधिक बलात्कार की घटनाएँ घटीं। अपराधियों के हौसले इतने बुलंद थे कि कई वारदातों में पुलिस-प्रशासन मूकदर्शक बना रहा। तत्कालीन सत्ताधारी दल के प्रभाव के कारण अनेक अपराधों में प्राथमिकी तक दर्ज नहीं होती थी – “क़ानून-व्यवस्था ऐसी बदहाल थी कि अधिकांश अपराध दर्ज ही नहीं होते थे क्योंकि अपराधियों को खुला सरकारी संरक्षण प्राप्त था”, जैसा बाद में जेडीयू अध्यक्ष ने भी उल्लेख किया।
सामूहिक नरसंहार (जातीय हत्याकांड) बिहार के इस दौर की एक और काली सच्चाई थे। जमीन और जाति के विवादों ने खूनखराबे का रूप ले लिया। ऊँची जाति के जमींदारों की निजी सेना रणवीर सेना ने दलित-पिछड़े ग्रामीणों पर अत्याचार करते हुए कई नरसंहार किए, वहीं प्रतिरोध में चरमपंथी गुटों द्वारा जवाबी हत्याकांड हुए। 1994 से 2000 के बीच 20 से अधिक बड़े जातीय नरसंहारों में कुल लगभग 337 लोग मारे गए। इनमें 1996 का बथानी टोला हत्याकांड (21 दलितों की निर्मम हत्या) और 1997 का लक्ष्मणपुर बाथे हत्याकांड (58 दलितों का नरसंहार) जैसे जघन्य उदाहरण शामिल हैं। स्वयं सरकारी आंकड़ों के मुताबिक लालू-राबड़ी शासन में 118 जातीय नरसंहार हुए – यह संख्या बिहार के उस अराजक दौर की भयावह तस्वीर पेश करती है।
अपहरण उद्योग: बिहार उस समय “किडनैपिंग कैपिटल” बन चुका था। व्यापारियों, डॉक्टरों, सरकारी अफसरों और यहाँ तक कि स्कूली बच्चों के अपहरण की घटनाएँ रोजमर्रा का हिस्सा बन गई थीं। फिरौती वसूलना संगठित अपराध का बड़ा जरिया बन गया। हालात इतने बेकाबू थे कि मशहूर फिल्म “अपहरण” (2005) की कथा इसी विषय पर आधारित थी। पटना जैसे शहरों में एक के बाद एक प्रमुख डॉक्टरों का अपहरण हुआ (2002 में तीन नामी चिकित्सकों को अगवा किया गया) जिसने आम जन में दहशत भर दी। हिंदुस्तान टाइम्स के फ़ोटो पत्रकार अशोक कर्ण के kidnapping मामले ने खास सुर्खियाँ बटोरीं – खुद लालू प्रसाद को हस्तक्षेप करना पड़ा और उन्होंने मीडिया से कहा “दो घंटे में उसे रिहा कर दिया जाएगा”। वाकई, उसी शाम पत्रकार को मुक्त भी कर दिया गया, जिससे यह सवाल उठा कि आखिर सरकार की अपराधियों पर इतनी पकड़ थी तो ऐसे अपहरण हुए ही क्यों? इस प्रकार कई घटनाओं में अपहृतों को छुड़ाने के लिए खुद सत्ताधारी नेताओं को मध्यस्थ की भूमिका निभानी पड़ती थी। कानून के डर से मुक्त अपराधी खुलेआम फिरौती और लूटपाट करते थे, जिनसे त्रस्त होकर हजारों व्यवसायी, पेशेवर और संपन्न परिवार बिहार छोड़ने पर मजबूर हुए। अपराध-राजनीति के इसी गठजोड़ और ख़ौफ़ के माहौल ने बिहार की अर्थव्यवस्था व समाज को गहरे जख्म दिए।
पाँच कुख्यात अपराधी और उनका आतंक
जंगल राज के दौर में कुछ अपराधी ऐसे उभरे जो “बाहुबली” या “डॉन” के नाम से कुख्यात हुए। इन अपराधी-नेताओं के नाम से लोगों में खौफ था और इन्हें राजनीतिक संरक्षण भी प्राप्त था। यहाँ हम उस दौर के पाँच सबसे कुख्यात अपराधी सरगनाओं का जिक्र करेंगे, जिनके अपराध, दबदबे और राजनीतिक सरंक्षण ने जंगल राज की कहानी गढ़ी:
1. मोहम्मद शहाबुद्दीन (आरजेडी)
मोहम्मद शहाबुद्दीन लालू प्रसाद यादव के बेहद क़रीबी माने जाते थे और चार बार आरजेडी के सांसद रहे। सीवान जिले में शहाबुद्दीन का ऐसा खौफ था कि उसे “सीवान का शाहाब” कहा जाने लगा – मानो वहाँ उसी का कानून चलता हो। उस पर 30 से अधिक संगीन आपराधिक मुकदमे दर्ज थे, जिनमें कई हत्याएँ, अपहरण, रंगदारी, अवैध हथियार रखना आदि शामिल थे। कहते हैं शहाबुद्दीन ने कॉलेज समय से ही अपराध की दुनिया में कदम रखा और 1990 में पहली बार विधायक बना। राजद शासन में उसकी ताकत इतनी बढ़ी कि सीवान उसका दुर्ग बन गया था – “पुलिस उसकी गुंडागर्दी पर आंख मूंद लेती थी और कोई गवाही देने की हिम्मत नहीं जुटाता था”। 2001 में पीयूसीएल (जन स्वतंत्रता परिषद) की रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि शहाबुद्दीन को आरजेडी सरकार से संरक्षण मिला हुआ था और कानून उसके आगे बेबस था। शहाबुद्दीन के गुर्गों ने पुलिस तक पर AK-47 से फायरिंग की; 2004 में उसे गिरफ्तार करने गई पुलिस टीम पर उसके समर्थकों ने हमला बोला जिसमें 2 पुलिसकर्मी मारे गए और कई गाड़ियाँ जला दी गईं। शहाबुद्दीन खुलेआम पुलिस अधिकारियों को थप्पड़ मारने या गोली चलाने से भी नहीं डरता था।
2004 के लोकसभा चुनाव तो उसने जेल में रहते हुए जीते, और चुनाव के दिन उसके आदमियों ने 500 से ज़्यादा बूथ लूट लिए थे। दरअसल, राजद ने उसे लगातार टिकट दिया और पार्टी में ऊँचा ओहदा दिया हुआ था, क्योंकि शहाबुद्दीन के पास मांसल शक्ति के साथ वोट जुटाने की क्षमता भी थी। आरजेडी ने अपराधी छवि के बावजूद न सिर्फ उसका बचाव किया बल्कि उसकी पत्नी हीना शहाब को दो बार लोकसभा का टिकट भी दिया जब शहाबुद्दीन स्वयं चुनाव लड़ नहीं सकता था। इन राजनैतिक सरंक्षण के चलते शहाबुद्दीन लंबे समय तक कानून की पकड़ से बचता रहा। “आरजेडी नेतृत्व हमेशा शहाबुद्दीन को खुश रखने में लगा रहा और उसके कानून से संघर्ष के बावजूद हर बार उसका साथ दिया”। अंततः 2005 में सत्ता परिवर्तन के बाद कानून का शिकंजा उस पर कसा गया। भारी मात्रा में हथियार बरामदगी और हत्या-अपहरण के मामलों में उसे उम्रकैद समेत कई सजाएँ हुईं। राज्य की स्थिति ऐसी थी कि सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप कर 2017 में शहाबुद्दीन को बिहार से तिहाड़ जेल स्थानांतरित करना पड़ा, ताकि वह अपने गढ़ से दूर रहकर बाहरी संपर्क न बना सके। शहाबुद्दीन जंगल राज के दौर का सबसे खौफनाक चेहरा था, जिसका राजनीतिक प्रभामंडल और आपराधिक साम्राज्य कानून-व्यवस्था को खुली चुनौती देते रहे।
2. राजेश रंजन उर्फ़ पप्पू यादव (पूर्व सांसद, विभिन्न दल)
पप्पू यादव 1990 के दशक में कोसी क्षेत्र से उभरने वाला एक दुर्दांत नाम था। वे कम उम्र में ही अपराध की दुनिया से जुड़ गए और अपने इलाके में युवाओं का एक गिरोह (“युवा शक्ति”) बना लिया जो अपराधों में संलिप्त था। मात्र 23 वर्ष की आयु में 1990 में विधायक बने और फिर 1991 में लोकसभा के लिए चुन लिए गए। 90 के दशक में पप्पू यादव पर हत्या, रंगदारी, अपहरण जैसे करीब 24 आपराधिक मामले दर्ज थे। वो “ट्रिगर-हैप्पी गैंगस्टर” के रूप में कुख्यात हुए और अपने बाहुबल के बल पर राजनीति में प्रभाव बनाये रखा। शुरुआत में वे लालू प्रसाद के करीबी रहे – उन्हें लालू का “ब्लू आइड बॉय” कहा जाता था – लेकिन 1992 में कुछ मतभेद के चलते अलग भी हुए। इसके बावजूद, बाद में राजनीतिक लाभ के लिए पप्पू को 1990 के दशक में और फिर 2004 में पुनः राजद ने गले लगाया। 1998 में पप्पू यादव का नाम सीपीआई(एम) के तेजतर्रार विधायक अजीत सरकार की हत्या में आया – अजीत सरकार को दिनदहाड़े गोलियों से भून दिया गया और आरोप था कि यह पप्पू के इशारे पर हुआ। इस बहुचर्चित हत्या कांड (1998) में लगभग 10 साल बाद 2008 में पप्पू यादव को दोषी ठहराया गया और उम्रकैद की सज़ा हुई। इस मामले में एक अन्य आरोपी रजन तिवारी (जो खुद पूर्व विधायक और अपराधी था) को भी उम्रकैद मिली। सज़ा सुनाए जाने तक पप्पू यादव सिटिंग एमपी थे और राजद ने 2004 में उन्हें मधेपुरा से टिकट देकर संसद भेजा था – गौरतलब है कि ये वही सीट थी जिससे पहले लालू यादव सांसद थे, लालू ने अपनी पारंपरिक सीट पप्पू के लिए छोड़ दी थी। ये घटना बताती है कि एक हत्या के आरोपी को भी राजनीतिक संरक्षण और संसद तक की सीट मिलने में कोई कठिनाई नहीं हुई। पप्पू यादव ने जेल में रहते हुए भी अपनी राजनीतिक रसूख बरकरार रखी, 2013 में पटना हाईकोर्ट से वह इस हत्या केस में सबूतों के अभाव में बरी भी हुए। बाद में उन्होंने अपनी खुद की पार्टी बनाई। मगर जंगल राज के दौर में पप्पू यादव का नाम “बाहुबली सांसद” का पर्याय बन गया था, जिनके क्षेत्र में बंदूक के साए तले सत्ता चलती थी। उनके संबंध विभिन्न पार्टियों से रहे, परन्तु आरोप यह था कि सत्ता में बैठे नेताओं ने उनके अपराधों पर मौन सहमति दी या उन्हें संरक्षण मिला। 2005 से पहले के बिहार में पप्पू यादव आतंक और सियासत के मिलेजुले प्रतीक रहे।
3. सुरजभान सिंह (एलजेपी)
सुरजभान सिंह बिहार के बेगूसराय क्षेत्र से उभरने वाला कुख्यात डॉन था जो बाद में लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) से सांसद बना। 1990 के दशक में सुरजभान पर हत्या, अपहरण, रंगदारी जैसे दर्जनों मुकदमे दर्ज थे, और उसका आतंक बिहार से सटे उत्तर प्रदेश तक फैला था। जनवरी 1992 में बेगूसराय के मथुरापुर गाँव में एक किसान रामी सिंह की हत्या में सुरजभान मुख्य आरोपी था। इस मामले की सुनवाई वर्षों खिंचती रही, पर अंततः 2008 में एक फास्ट-ट्रैक कोर्ट ने सुरजभान को दोषी करार दिया। वह तब तक लोजपा के टिकट पर बाढ़ (बड़िया) से सांसद चुना जा चुका था, और फैसला आने के समय बिहार से संसद में प्रतिनिधित्व कर रहा तीसरा सांसद था जिसे आपराधिक मामले में दोषी ठहराया गया (अन्य दो उसी दौरान दोषी ठहराए गए थे – एक शहाबुद्दीन (आरजेडी सांसद) और दूसरे पप्पू यादव (आरजेडी सांसद))। अदालत ने सुरजभान को 1992 के हत्या कांड में उम्रकैद की सज़ा सुनाई, जिससे उसका संसदीय करियर समाप्त हुआ। सुरजभान की छवि एक ऐसे बाहुबली की रही जिसे राजनीतिक शरण मिला – रामविलास पासवान जैसे नेता ने उसे पार्टी में लेकर चुनाव लड़वाया। दरअसल, 2000 के दशक की शुरुआत में कई राजनीतिक दल खुलेआम बाहुबलियों को टिकट दे रहे थे। हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार सुरजभान बिहार का तीसरा ऐसा मौजूदा सांसद था जिसे आपराधिक मामले में सज़ा हुई। सुरजभान के संरक्षण का अंदाज़ा इससे भी मिलता है कि उसके खिलाफ चल रहे मामलों में अक्सर गवाह या तो टूट जाते थे या मामले लटकते रहते थे – एक सरकारी वकील की 2006 में हुई हत्या तक को इस केस की देरी से जोड़ा गया। सुरजभान सिंह जंगल राज का वह चेहरा है जिसने यह दिखाया कि कैसे अपराधी सीधे संसद तक पहुँच गए और वर्षों तक कानूनी कार्रवाई से बचते रहे, जब तक सत्ता बदली नहीं।
4. आनंद मोहन सिंह (पूर्व सांसद)
आनंद मोहन सिंह अपने दौर के सबसे कुख्यात अपराधी-राजनेताओं में से एक रहे, हालांकि इनकी राजनीतिक राह अन्य से कुछ भिन्न थी। ये प्रारंभ में लालू विरोधी धड़े के राजपूत नेता के रूप में उभरे थे और खुद की पार्टी (बिहार पीपुल्स पार्टी) बनाई थी। बावजूद इसके, अपराध और सियासत के गठजोड़ से ये भी अछूते नहीं रहे। आनंद मोहन पर सबसे संगीन आरोप 1994 में गोपालगंज के ज़िला कलेक्टर जी. कृष्णैया की भीड़ द्वारा हत्या का है। दिसंबर 1994 में एक गैंगस्टर कोशलेंद्र उर्फ छोटन शुक्ला (जो आनंद के क़रीबी थे) की हत्या के विरोध में निकाले जा रहे जुलूस में भीड़ उग्र हो गई और रास्ते से गुजर रहे दलित आईएएस अफसर कृष्णैया को वाहन से खींचकर पीट-पीटकर मार डाला गया। आनंद मोहन पर आरोप था कि उन्होंने उकसा कर इस भीड़ से यह जघन्य हत्या करवाई, क्योंकि उनकी राजनीति उस समय ऊँची जाति बनाम प्रशासन के टकराव की धुरी पर चल रही थी। इस सनसनीखेज केस में 2007 में निचली अदालत ने आनंद मोहन को मृत्युदंड सुनाया – वे स्वतंत्र भारत के पहले पूर्व सांसद थे जिन्हें फाँसी की सज़ा हुई। हालाँकि, 2008 में पटना हाईकोर्ट ने इसे आजीवन कारावास में बदल दिया और 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने उम्रकैद बरकरार रखी। लगभग 15 साल जेल में रहने के बाद 2023 में बिहार सरकार ने नियमों में ढील देकर उन्हें रिहा कर दिया, जिस पर काफ़ी विवाद हुआ। जंगल राज के दौर में आनंद मोहन अपने इलाके (कोसी क्षेत्र) में दबंगई के लिए मशहूर थे। रिपोर्टों के मुताबिक लालू शासन के दौरान उन्हें भी परोक्ष रूप से संरक्षण मिला – एक रिपोर्ट बताती है कि उस सरकार ने शहाबुद्दीन और तस्लीमुद्दीन की तरह आनंद मोहन जैसों को भी व्यवस्था का फायदा उठाने दिया। दिलचस्प यह है कि जिन लालू प्रसाद के विरोध के नाम पर आनंद मोहन ने अपनी राजनीति चमकाई, उसी राजद में उनके परिजनों को बाद में स्थान मिला। यह विडंबना जंगल राज की ही देन थी कि अपराध और राजनीति इतनी घुलमिल गई थी कि दोस्त-दुश्मन का फ़र्क़ मिट गया, बस सत्ता और लाभ ही प्राथमिकता बन गए। आनंद मोहन को राजनैतिक समर्थन विभिन्न चरणों में मिलता रहा – हाल के वर्षों में तो उनके पक्ष में कानून तक बदले गए – जो दर्शाता है कि बाहुबलियों का रसूख समय के साथ भी कायम रहा।
5. मोहम्मद तस्लीमुद्दीन (आरजेडी)
मो. तस्लीमुद्दीन उस दौर के शायद सबसे विवादित राजनीतिज्ञ थे जिनका अपराध रिकॉर्ड बेहत लंबा था। अररिया-किशनगंज क्षेत्र से आने वाले तस्लीमुद्दीन पर हत्या के प्रयास, अपहरण, मारपीट, अवैध हथियार जैसे 17 से अधिक मामले दर्ज थे। इसके बावजूद लालू यादव ने उन्हें न सिर्फ राजद में अहम स्थान दिया बल्कि 1996 में देवेगौड़ा की केंद्र सरकार में राज्य मंत्री (गृह) जैसे महत्वपूर्ण पद पर भी भेजा। यह कदम बेहद विवादास्पद साबित हुआ – उस समय तस्लीमुद्दीन के खिलाफ गैर-जमानती वारंट लंबित था और उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि पर संसद में हंगामा खड़ा हो गया। आखिरकार दबाव में प्रधानमंत्री देवेगौड़ा को तस्लीमुद्दीन को मंत्रिमंडल से बर्खास्त करना पड़ा। यह घटना दर्शाती है कि बिहार में अपराधी छवि वाले नेताओं को किस हद तक राजनीतिक पुरस्कार मिले, कि एक हत्या-अपहरण जैसे मामलों में अभियुक्त व्यक्ति गृह राज्य मंत्री के पद तक पहुँच गया*। तस्लीमुद्दीन कई बार सांसद बने और उनके प्रभाव के चलते कई मामलों में राज्य सरकार ने उन पर से केस भी वापस लिए। टेलीग्राफ की एक रिपोर्ट बताती है कि 2004 में केंद्र में राजद के सहयोग से सरकार बनते ही लालू यादव ने तस्लीमुद्दीन सहित तीन दागी नेताओं को केंद्रीय मंत्रिपरिषद में शामिल कराया था। तस्लीमुद्दीन पर गंभीर आरोपों में हत्या और अपहरण तक शामिल थे, फिर भी वे बिहार की राजनीति में मज़बूती से टिके रहे। उनके “वफादार मुस्लिम नेता” होने के नाते राजद ने उनका बचाव किया। सुनियोजित राजनीतिक संरक्षण का अंदाज़ा इससे भी लगता है कि 2018 में जेडीयू ने भी चुनाव से पहले तस्लीमुद्दीन जैसे नेता को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया, यानि सभी दलों द्वारा ऐसे बाहुबलियों को महत्व दिया जाता रहा। तस्लीमुद्दीन की कहानी जंगल राज में सत्ताधारी पार्टी द्वारा अपराधियों को प्रश्रय देने का प्रत्यक्ष प्रमाण है। उनकी दबंग छवि के चलते उनके खिलाफ गवाह-पुलिस सभी भयभीत रहते थे और वे कानून की गिरफ्त से बचते-बचाते राजनीति करते रहे।
राजनीतिक संरक्षण और अपराध का गठजोड़
जंगल राज के दौर में राजनीति और अपराध का मेल अपनी चरम सीमा पर था। सत्ताधारी नेताओं द्वारा अपराधियों को सरंक्षण देना आम बात हो चली थी, क्योंकि इन बाहुबलियों के जरिए वोट बैंक और क्षेत्रीय पकड़ कायम रखी जाती थी। पूर्व पटना कॉलेज प्राचार्य नवाल किशोर चौधरी के शब्दों में, “नेता अपने स्वार्थ के लिए अपराधियों को बचाते रहे। राजद ने शहाबुद्दीन जैसे गैंगस्टर को बचाया तो नीतीश कुमार ने कभी आनंद मोहन की रिहाई के लिए नियम बदल डाले”। लालू-राबड़ी शासनकाल में तो अपराधियों को खुला राजनीतिक आश्रय प्राप्त था। विश्वसनीय रिपोर्टों के अनुसार उस सरकार के समय “शहाबुद्दीन, आनंद मोहन, तस्लीमुद्दीन जैसे गैंगस्टरों को योजनाबद्ध तरीके से सरंक्षण दिया गया”। वरिष्ठ पत्रकार अरुण सिन्हा अपनी किताब ‘नितीश कुमार ऐंड द राइज़ ऑफ़ बिहार’ में लिखते हैं कि लालू-राबड़ी का राज “लूट और अराजकता की ऐसी संस्कृति का प्रतीक था जहाँ बदमाशों और गुंडों को खुली छूट मिली हुई थी”। उन्होंने ये भी बताया कि उस दौर में थानों को आदेश थे कि अगर कोई आरोपी किसी सत्ताधारी नेता का संरक्षित है तो उसके खिलाफ शिकायत दर्ज करने में भी आना-कानी करो। मतलब, अपराधियों को राजनीतिक “छत्रछाया” मिली हुई थी और कानून-व्यवस्था तंत्र पंगु बना दिया गया था। स्वयं एक पूर्व डीजीपी डी.पी. ओझा ने 2003 में हाईकोर्ट को मजबूरी में कहा था कि “पुलिस की हालत महाभारत के अंधे धृतराष्ट्र जैसी हो गई है जो राज्य (द्रौपदी) का चीरहरण नहीं रोक पा रहा” – इस बयान से साफ है कि उच्च प्रशासनिक अधिकारी भी उस समय खुद को बेबस महसूस करते थे।
राजनीतिक दलों द्वारा बाहुबलियों को टिकट देना, मुकदमों में हस्तक्षेप कर उन्हें बचाना, जेल में उन्हें सुविधाएँ देना आम हो गया था। आरजेडी शासन में तो कई कुख्यात अपराधी खुद राजद के विधायक/सांसद थे या पार्टी के पदाधिकारी थे – शहाबुद्दीन आरजेडी राष्ट्रीय कार्यकारिणी में थे और लालू यादव उनसे सीधे फोन पर प्रशासनिक मामलों पर बात करते पाए गए। सरकार के मंत्रियों-सांसदों के परिजन तक अपहरण के शिकार हुए तो उन्हें छुड़ाने के लिए भी फिरौती देनी पड़ी, जैसा कि खुद एक मंत्री के रिश्तेदार के अपहरण (2003) में पुलिस महानिदेशक ने कोर्ट में माना था। सुप्रीम कोर्ट को कई मामलों में बिहार की विधि-व्यवस्था पर सख्त टिप्पणियाँ करनी पड़ीं – उदाहरणस्वरूप अदालत ने निचली अदालतों में सालों से लंबित मामलों में हस्तक्षेप कर तेज़ सुनवाई कराई और शहाबुद्दीन जैसा प्रभावशाली अपराधी अपने राज्य से बाहर तिहाड़ जेल में रखने का आदेश दिया। मीडिया ने भी जंगल राज को लगातार उजागर किया। अखबारों और चैनलों ने इस दौर को “अराजकता का दौर”, “बिहार में माफियाराज” जैसी सुर्खियों से नवाज़ा। न्यूज़लॉन्ड्री की एक रिपोर्ट बताती है कि उस समय पार्टी समर्थकों ने लालू की बेटी की शादी में मेहमानों के लिए शोरूम से 50 नई गाड़ियाँ तक जबरन उठा ली थीं – यह घटना राजद सरकार की गुंडागर्दी को सरेआम दर्शाती है। पटना के व्यापारियों ने डर के मारे अपने शोरूम बंद कर दिए और बाहर कंपनियों ने बिहार से अपना कारोबार समेट लिया। टाइम्स ऑफ इंडिया ने 2025 में लिखे एक आलेख में साफ कहा कि “जिन लोगों ने राजनीतिक फायदे के लिए अपराधी सरगनाओं को संरक्षण दिया था, उन्हें पहले अपने दौर के जंगल राज के लिए माफी मांगनी चाहिए”। कुल मिलाकर, बिहार के जंगल राज में राजनीति अपराध की संरक्षक बन गई थी – अपराधी नेता बन गए और नेता अपराधियों के संरक्षक।
सुप्रीम कोर्ट व मीडिया की प्रमुख टिप्पणियाँ
बिहार के जंगल राज पर समय-समय पर न्यायपालिका और मीडिया ने कड़ी टिप्पणियाँ की हैं। जैसा पहले उल्लेख हुआ, पटना हाई कोर्ट ने 1997 में राज्य को “जंगल राज” कहकर संबोधित किया था। आगे चलकर सुप्रीम कोर्ट ने भी कई मामलों में बिहार की कानून-व्यवस्था पर अप्रसन्नता जताई। एक मामले में शीर्ष अदालत ने कहा कि “राज्य में क़ानून का राज कायम करने में असफलता पर अदालत मूकदर्शक नहीं रह सकती” – और इसी भावना से सुप्रीम कोर्ट ने शहाबुद्दीन, अनंत सिंह, मुनna शुक्ला जैसे बाहुबलियों के खिलाफ चल रहे मामलों की मॉनिटरिंग की, उनकी ज़मानत रद्द की तथा ट्रायल तेज़ करवाए। 2017 में शाहाबुद्दीन को बिहार से बाहर स्थानांतरित करने के आदेश को भी मीडिया ने “जंगल राज को लगाम” की तरह देखा। मीडिया ने अनेक संपादकीयों में बिहार के 1990-2005 के काल को “अंधकार युग” कहा। इंडियन एक्सप्रेस में छपे एक लेख में जंगल राज को “राज्य प्रायोजित अराजकता और भ्रष्टाचार का दौर, जहाँ अपहरण एक उद्योग था” कहा गया। BBC और अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी रिपोर्ट किया कि उस समय बिहार में “law and order collapsed” (कानून व्यवस्था ध्वस्त) हो चुकी थी, जिससे बिहार की छवि देशभर में धूमिल हुई। 2005 के बाद नई सरकार बनने पर सुप्रीम कोर्ट ने “बिहार सरकार ने आखिरकार राज्य को जंगल राज से निकालने के प्रयास शुरू किए हैं” जैसी सकारात्मक टिप्पणियाँ भी कीं, जब तेज़ सुनवाई से हजारों दोषियों को सज़ा मिली। कुल मिलाकर, न्यायपालिका ने जंगल राज को रोकने हेतु कड़े कदम उठाए और मीडिया ने निडर होकर सच्चाई को उजागर किया। इन दोनों ने मिलकर जनता के सामने उस दौर की सच्ची तस्वीर रखी और परिवर्तन की नींव रखने में अहम भूमिका निभाई।
1990 से 2005 का बिहार का जंगल राज भारतीय राजनीति के इतिहास में अपराध और सत्ता के घालमेल का एक भयावह अध्याय है। इस दौर ने दिखाया कि जब राजनीतिक स्वार्थ के लिए कानून को ताक पर रखा जाए, तो समाज में कैसी अराजकता फैलती है। अपहरण, हत्या, नरसंहार और भ्रष्टाचार से ग्रस्त उस कालखंड ने बिहार को विकास की दौड़ में दशकों पीछे धकेल दिया। हालांकि 2005 के बाद शासन बदलने पर सुधार की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन जंगल राज शब्द आज भी एक चेतावनी की तरह प्रयोग होता है – यह याद दिलाने के लिए कि कानून के राज के बगैर लोकतंत्र “जंगल” बनते देर नहीं लगती। बिहार की जनता ने 2005 में इस जंगल राज को सत्ता से उखाड़ फेंका था, पर इसकी यादें और सबक आने वाली पीढ़ियों के लिए शेष हैं। बिहार ने उस अराजक दौर से बाहर निकल कर काफ़ी प्रगति की है, मगर “जंगल राज” के साये से उबरने के लिए सुशासन, जवाबदेही और कड़ी कानून व्यवस्था बनाए रखना एक स्थायी जरूरी प्रयास होगा।
हमारे स्रोत (Sources):
विश्वसनीय समाचार रिपोर्ट एवं विश्लेषण: इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया, इंडिया टुडे आदि। उपरोक्त सभी तथ्यों व उद्धरणों को संबंधित स्रोत संदर्भ क्रमांक द्वारा सत्यापित किया गया है। जिन घटनाओं, आंकड़ों व टिप्पणियों का उल्लेख किया गया है, उनके प्रमाण निम्नलिखित संदर्भों में मौजूद हैं – आदि। (इन स्रोत संदर्भों में विस्तार से तथ्यों की पुष्टि की जा सकती है।)


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