New Year 2025: विभिन्न संस्कृतियों में नव वर्ष के विविध रूप

समाज
आकांक्षा यादव (लेखिका)

विचार डेस्क: नव वर्ष मानव इतिहास की सबसे पुरानी पर्व परंपराओं में से एक है। नव वर्ष का स्वागत करना मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति रही है, जो नई शुरुआत और आशा की भावना से जुड़ी होती है। यह उत्सव विश्वभर की संस्कृतियों में विभिन्न रूपों में मनाया जाता है, जो उनकी कैलेण्डर प्रणाली, परंपराओं और आस्थाओं पर आधारित होता है।

इतिहास में नव वर्ष का प्रारंभ

यदि इतिहास में झांकें तो प्राचीन बेबिलोनियन लोग लगभग 4000 वर्ष पूर्व से नव वर्ष का उत्सव मनाते आ रहे हैं। उस समय यह पर्व 21 मार्च को वसंत के आगमन के अवसर पर मनाया जाता था। प्राचीन रोमन कैलेंडर में वर्ष का आरंभ 1 मार्च से होता था, जिसमें केवल 10 महीने थे। 713 ई.पू. के करीब जनवरी और फरवरी जोड़े गए। 153 ई.पू. में पहली बार 1 जनवरी को वर्ष का प्रारंभ माना गया और 45 ई.पू. में जब जूलियस सीज़र ने जूलियन कैलेंडर लागू किया, तब यह परंपरा स्थायी हो गई। 1582 ई. में ग्रेगेरियन कैलेंडर के आरंभ के साथ 1 जनवरी को नव वर्ष का वैश्विक रूप से मनाया जाने लगा।

विभिन्न संस्कृतियों में नव वर्ष

पश्चिमी परंपराएँ

  • ब्रिटेन: यहाँ नव वर्ष का स्वागत आतिथ्य भाव से किया जाता है। मान्यता है कि वर्ष का पहला मेहमान सौभाग्य लाता है, बशर्ते वह पुरुष हो और तोहफा लाए।
  • डेनमार्क: लोग अपने प्रियजनों के घरों के सामने पुरानी प्लेटें तोड़ते हैं, जिसे दोस्ती और आत्मीयता का प्रतीक माना जाता है।
  • स्पेन और पुर्तगाल: लोग 12 अंगूर खाते हैं, जो आगामी 12 महीनों में समृद्धि और खुशहाली लाने का प्रतीक माने जाते हैं।
  • जर्मनी: लोग पिघले सीसे को ठंडे पानी में डालकर बनने वाली आकृतियों से भविष्य की भविष्यवाणी करते हैं।
  • फिलीपींस: लोग पोल्का डॉट्स वाले कपड़े पहनते हैं और गोल फल खाते हैं, जो समृद्धि का प्रतीक माने जाते हैं।

एशियाई परंपराएँ

  • चीन: यहाँ नव वर्ष चंद्र कैलेंडर के अनुसार मनाया जाता है, जो प्रायः 21 जनवरी से 21 फरवरी के बीच पड़ता है।
  • जापान: नव वर्ष ‘ओसोगात्सु’ के रूप में मनाया जाता है, इस दिन 108 घंटियाँ बजाई जाती हैं, जो बुरी शक्तियों के विनाश का प्रतीक होती हैं।
  • भारत: भारत में विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग तिथियों पर नव वर्ष मनाया जाता है। विक्रम संवत, शक संवत, बौद्ध और जैन संवत, तेलुगु संवत जैसी कई प्रणालियाँ प्रचलित हैं। महाराष्ट्र में ‘गुड़ी पड़वा’, आंध्र प्रदेश में ‘उगादी’, असम में ‘बीहू’, तमिलनाडु में ‘पुथांडु’ और केरल में ‘विशु’ के रूप में नव वर्ष मनाया जाता है।

नव वर्ष का महत्व

नया वर्ष नई उम्मीदें, नए सपने, नए लक्ष्य और नए विचार लेकर आता है। यह आत्मविश्लेषण, नई शुरुआत और सकारात्मकता का अवसर होता है। हर व्यक्ति के लिए इसका अपना अलग महत्व होता है। कुछ लोग इसे एक सामान्य दिन की तरह देखते हैं, तो कुछ इसे अपने जीवन में नए संकल्पों और बदलावों की शुरुआत के रूप में अपनाते हैं।

नव वर्ष हमें आशा और ऊर्जा से भर देता है, जिससे हम आगे बढ़ने और अपने जीवन को नई दिशा देने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं। आइए, हम सभी नव वर्ष की शुरुआत अच्छे कार्यों और नेक इरादों के साथ करें और इसे सकारात्मकता व समृद्धि से भरपूर बनाएं।

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